Tuesday, January 19, 2010

बस एक लकीर

आंसूं जो आये बिन बताये
चले जाएँ, एक लकीर छोड़ के
नुकूश दिखा रहे हों जो
एक एहसास का, जो था कभी
पर अब छोड़ जाता है... बस एक लकीर

रिश्तों के जाल में उलझना
संभलना , समभल के फिर उलझना
मकड़ी के जाल की तरह , सुन्दर भी तो नहीं
ना ही कोई पैटंर्न है
फिर इतना क्यों तड़पाता है, विचलित करता है
क्यों नहीं छोड़ देता , मुझे अपने हाल पे

शायद साथ देने के वादा जो था
हमेशा के लिए, तो देता है
रहता है साथ मेरे
कुरेद कर कुछ घाओं को, रिसता रहता है
हाँ... छोड़ जाता है... बस एक लकीर

यादों का सिलसिला चलता जाता है
हर मोड़ पे एक नया रोष
ऐसा, जो गर कह दूं , तो शायद शिकवा हो
सो रहने देता हूँ, बढ़ने देता हूँ
पनपता है , फिर ठहर जाता है
सोचने लगता है, हुंह ... समझदार जो है
फिर एक टीस छोड़ के चला जाता है ...
हाँ... छोड़ जाता है ... बस एक लकीर

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