जहाँ न हों जीवन की चिंताएँ,
न हों जहाँ कोई संताप
जहाँ न कोई भाग्य को कोसे ,
और न ही कोई करे विलाप
निर्मित करें उस पार पहुँच हम,
एक नूतन संसार
चलो, चलें अब क्षितिज के उस पार
सत्य ही जहाँ मार्गदर्शक हो,
विजय का जहाँ विशवास अटल हो
कर्तव्य मार्ग से विचलित हों न,
मार्ग में चाहे क्यों न अचल हों
जहाँ जीवन के प्रत्येक निर्णय का,
सत्य ही बने आधार
चलो, चलें अब क्षितिज के उस पार
तड़ित के हर एक तड़प पर
जहाँ वर्षा जल से मोतियाँ बिखरें
परस्पर अनुराग वशीभूत
जहाँ मृग व्याघ्र भी साथ में विचरें
प्रेम के सुंदर जगत का,
दिव्य स्वपन करें साकार
चलो, चलें अब क्षितिज के उस पार
न्याय रक्षा हेतु कभी भी,
पाँव न पीछे हटने पाये
शत्रु कभी आए भी लड़ने,
तो प्रेम रंग में वो भी रंग जाए
जहाँ शत्रु को भी गले लगाकर
मित्रता का दे उपहार
चलो, चलें अब क्षितिज के उस पार
यह मेरी पहली कविता थी जो मैंने ९ क्लास में लिखी थी
हिन्दी साहित्य से यह मेरा पहला परिचय था
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